Andhra Pradesh BIEAP AP Inter 1st Year Hindi Study Material उपवाचक 1st Lesson बहू की विदा Questions and Answers Summary.
Inter 1st Year Hindi बहू की विदा Questions and Answers
अभ्यास
प्रश्न 1.
“बहू की विदा” एकांकी का सारांश लिखिए ।
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी ” बहू की विदा” श्री विनोद रस्तोगी द्वारा रचित है। इस एकांकी के माध्यम से लेखक ने हमारे समाज में व्याप्त दहेज की समस्या को दर्शाया हैं ।
इस एकांकी में कुल पाँच पात्र हैं- जीवनलाल उनकी पत्नी राजेश्वरी, उनका बेटा रमेश, बहू कमला और प्रमोद जो कमला का भाई हैं । प्रमोद की बहन कमला का विवाह जीवनलाल के पुत्र रमेश के साथ होता हैं । प्रमोद अपनी पारिवारिक हैसियत के हिसाब से दहेज देता है। जीवनलाल आशा के अनुरूप दहेज न मिलन से चिढ़ा हुआ रहता है। विवाह के बाद पहला सावन आने पर बहू को उसके मायके भेजे जाने की एक रस्म होती हैं उसी रस्म को पूरी करने के लिए प्रमोद अपनी बहन कमला को विदा करने उसके ससुराल पहुँचता हैं परंतु कमला के ससुर जीवनलाल अपनी बहू की विदा नहीं करना चाहते ।
जीवनलाल के अनुसार बेटे की शादी में बहू कमला के परिवार वालों ने उनकी हैसियत के हिसाब से उनकी खातिरदारी नहीं की तथा कम दहेज दिया । इससे उनके मान पर धब्बा लगा है | अब जब तक दहेज की पूरी रक्म अर्थात् पाँच हजारा नहीं चुका दी जाती वह कमला को मायके विदा नहीं करेगा । प्रमोद जीवनलाल से अपनी बहन को मायके भेजने की प्रार्थना करता है और केवल लड़की वाला होने के कारण उस पर होने वाले अन्याय का विरोध करता है ।
इस पर जीवनलाल उसे अपनी बेटी गौरी के विवाह का उदाहरण देते हुए कहता है कि वे भी लडकी वाले है परंतु उसने अपनी बेटी का विवाह बडे धूमधाम से किया। उसने अपनी बेटी ससुराल वालों की इतनी खातिरदारी की कि सभी दंग रह गए। इसलिए लडकीवाले होते हुए भी उनकी मूछ ऊँची ही हैं। इस समय उनका बेटा रमेश अपनी बहन गौरी को विदा करवाने उसके ससुराल गया है और किसी भी समय रमेश अपनी बहन गौरी को लेकर यहाँ पहुँचता ही होगा ।
प्रमोद उसके बाद अपनी बहन कमला से मिलता है और उसे सांत्वना देते हुए कहता है कि वह वापस अपना घर बेच देगा और दहेज की रक्म का जुगाड़ कर लेगा । इस पर कमला अपने भाई को समझाती है कि घर बेचने की बात वह बिल्कुल न करें क्योंकि अभी उसकी छोटी बहन विमला के विवाह की जिम्मेदारी उसके सिर पर हैं।
और क्या हुआ यदि वह पहला सावन अपने मायके में न बिता पाए । यहाँ ससुराल में उसकी सास और ननद गौरी बहुत अच्छी है। गौरी के आने से तो उसे अपनी सखियाँ को कभी भी नहीं खेलेंगी। उसी समय कमला की सास राजेश्वरी प्रमोद से कहती है कि ये पाँच हजार रूपए वह जीवनलाल को देकर कमला को विदा कर ले जाय । प्रमोद पैसे लेने से इंकार कर देता है ।
उसी समय रमेश बिना अपनी बहन गौरी को विदा किए घर पहुँचता है। गौरी ससुरालवालों ने भी कम दहेज का बहाना बनाकर गौरी को विदा करने से मना कर दिया था । जीवनलाल को अपने बेटी के ससुराल वालों का रवैया अन्यायपूर्ण लगता है। उसे अपने बेटी के ससुराल वाले लोभी- लालची नजर आने लगते हैं। क्योंकि उसके अनुसार उसने तो अपने जीवन भर की कमाई अपनी बेटी गौरी के ससुराल वालों को दे दी थी । दहेज देने के बावजूद उसकी बेटी गौरी के ससुराल वालों ने कम दहेज की वजह से उसके भाई के साथ विदा न करके जीवनलाल को अपना अपमाना लगता है ।
इस घटना को देखकर जीवनलाल का हृदय परिवर्तन हो जाता है। और वह खुशी-खुशी अपनी बहू के साथ कर रहा हैं उसकी बेटी के साथ वैसा व्यवहार उसके ससुराल वाले भी कर सकते है । एकांकी में एक कान की कार ने बहू बेटी के अंतर को समाप्त करने को पारिवारिक और मानसिक स्तर पर हितकर मानकर माना है ।
![]()
बहू की विदा Summary in Hindi
एकांकीकार का परिचय
विनोद रस्तोगी का जन्म सन् 1923 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के शमसाबाद नामक गाँव में हुआ । उनकी आरंभिक शिक्षा फ़र्रुखाबाद में तथा स्नातक स्तर की शिक्षा कानपुर में हुई। हिंदी विषय में एम. ए. के बाद रस्तोगी जी आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र में नाट्य निर्देशक के पद पर कार्य करने लगे । उन्होंने नाट्य – साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश किये। अब तक उनके आठ उपन्यास तथा दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
उनकी अनेक रचनाएँ पुरस्कृत की जा चुकी हैं। ‘नए हाथ’, ‘आज़ादी के बाद’, ‘बर्फ़ की मीनार’, ‘गोपा का दान’, ‘दरारें’, ‘रूपया’, ‘रूप और रोटी’, ‘भगीरथ के बेटे’, उनकी बहुचर्चित रचनाएँ हैं । उनकी रचनाओं में जीवन की समस्याओं का चित्रण हुआ है। आधुनिक जीवन की मानसिक कुंठाओं को उन्होंने अपने एकांकियों में स्थान दिया है ।
सारांश
प्रस्तुत एकांकी “बहू की विदा” श्री विनोद रस्तोगी द्वारा रचित है। इस एकांकी के माध्यम से लेखक ने हमारे समाज में व्याप्त दहेज की समस्या को दर्शाया हैं ।
इस एकांकी में कुल पाँच पात्र हैं- जीवनलाल उनकी पत्नी राजेश्वरी, उनका बेटा रमेश, बहू कमला और प्रमोद जो कमला का भाई हैं । प्रमोद की की बहन का कमला का विवाह जीवनलाल के पुत्र रमेश के साथ होता हैं । प्रमोद अपनी पारिवारिक हैसियत के हिसाब से दहेज देता है । जीवनलाल आशा के अनुरूप दहेज न मिलन से चिढ़ा हुआ रहता है ।
विवाह के बाद पहला सावन आने पर बहू को उसके मायके भेजे जाने की एक रस्म होती हैं उसी रस्म को पूरी करने के लिए प्रमोद अपनी बहन कमला को विदा करने उसके ससुराल पहुँचता हैं परंतु कमला के ससुर जीवनलाल अपनी बहू की विदा नहीं करना चाहते। जीवनलाल के अनुसार बेटे की शादी में बहू कमला के परिवार वालों ने उनकी हैसियत के हिसाब से उनकी खातिरदारी नहीं की तथा कम दहेज दिया। इससे उनके मान पर धब्बा लगा है।
अब जब तक दहेज की पूरी रक्म अर्थात् पाँच हजारा चुका दी जाती वह कमला को मायके विदा नहीं करेगा । प्रमोद जीवनलाल से अपनी बहन को मायके भेजने की प्रार्थना करता है और केवल लड़की वाला होने के कारण उस पर होने वाले अन्याय का विरोध करता है। इस पर जीवनलाल उसे अपनी बेटी गौरी के विवाह का उदाहरण देते हुए कहता है कि वे भी लडकी वाले है परंतु उसने अपनी बेटी का विवाह बडे धूमधाम से किया ।
उसने अपनी बेटी के ससुराल वालों की इतनी खातिरदारी की कि सभी दंग रह गए। इसलिए लडकीवाले होते हुए भी उनकी मूछ ऊँची ही हैं। इस समय उनका बेटा रमेश अपनी बहन गौरी को विदा करवाने उसके ससुराल गया है और किसी भी समय रमेश अपनी बहन गौरी को लेकर यहाँ पहुँचता ही होगा ।
प्रमोद उसके बाद अपनी बहन कमला से मिलता है और उसे सांत्वना देते हुए कहता हैं कि वह वापस अपना घर बेच देगा और दहेज की रक्म का जुगाड़ कर लेगा। इस पर कमला अपने भाई को समझाती है कि घर बेचने की बात वह बिल्कुल न करें क्योंकि अभी उसकी छोटी बहन विमला के विवाह की जिम्मेदारी उसके सिर पर हैं।
और क्या हुआ यदि वह पहला सावन अपने मायके में न बिता पाए । यहाँ ससुराल में उसकी सास और ननद गौरी बहुत अच्छी है। गौरी के आने से तो उसे अपनी सखियाँ को कभी भी नहीं खेलेंगी । उसी समय कमला की सास राजेश्वरी प्रमोद से कहती हैं कि ये पाँच हजार रूपए वह जीवनलाल को देकर कमला को विदा कर ले जाय । प्रमोद पैसे लेने से इंकार कर देता है ।
उसी समय रमेश बिना अपनी बहन गौरी को विदा किए घर पहुँचता है। गौरी ससुरालवालों ने भी कम दहेज का बहाना बनाकर गौरी को विदा करने से मना कर दिया था । जीवनलाल को अपने बेटी के ससुराल वालों का रवैया अन्यायपूर्ण लगता है। उसे अपने बेटी के ससुराल वाले लोभी-लालची नजर आने लगते हैं ।
क्यों कि उसके अनुसार उसने तो अपने जीवन भर की कमाई अपनी बेटी गौरी के ससुराल वालों को दे दी थी । दहेज देने के बावजूद उसकी बेटी गौरी के ससुराल वालों ने कम दहेज की वजह से उसके भाई के साथ विदा न करके जीवनलाल को अपना अपमाना लगता है। इस घटना को देखकर जीवनलाल का हृदय परिवर्तन हो जाता है । और वह खुशी-खुशी अपनी बहू के साथ कर रहा हैं उसकी बेटी के साथ वैसा व्यवहार उसके ससुराल वाले भी कर सकते है। एकांकी में एक कान की कार ने बहू बेटी के अंतर को समाप्त करने को पारिवारिक और मानसिक स्तर पर हितकर मानकर माना है ।
![]()
बहू की विदा Summary in English
The play “Bahu Ki – Vida”, which carried a very relevant social message and warns against the evil of dowry was written by Vinod Rastogi.
The play opens at the home of one ‘Jeevan Lal’ where ‘Pramod’ has come to take his sister home for her first visit after marriage. The occasion is very special and auspicious but Jeevan Lal makes it bitter by embracing Pramod as they had given less dowry at the marriage of ‘Kamala’, Jeevan Lal’s daughter-in-law.
He denies sending her to her maternal home to complete the rituals to show his gesture of contempt. He also boasts that they had send their daughter with a huge dowry, when she got married and she would have been treated very warmly at the place of her in-laws.
is son Ramesh has gone to receive her for ‘Vida’ i.e., farewell and would come back with her very gracefully. But at the same time, to the dismay of all, Ramesh comes back home alone as the in-laws of his sister had refused to send her home as the dowry, which they considered enough was not good enough for them and they expected more. Shattered by this, Jeevan Lal realizes his mistake and agrees to send Kamala with Pramod. He respects his daughter-in-law as respects his daughter.
बहू की विदा Summary in Telugu
వరకట్న దురాగతానికి వ్యతిరేకంగా మరియు చాలా సందర్భోచితమైన సామాజిక సందేశంతో కూడి ఉన్న ‘బహూ కీ విదా’ నాటకం వినోద్ రస్తోగీచే వ్రాయబడింది.
ఈ నాటకం జీవన్లాల్ అనే వ్యక్తి ఇంట్లో మొదలైంది. అక్కడ ప్రమోద్ తన సోదరిని మొదటిసారిగా తమ ఇంటికి తీసుకొని వెళ్ళటానికి వస్తాడు. ఇది ప్రత్యేకమైన, పవిత్రమైన సందర్భం. కాని, తమ కోడలు కమలకు పెండ్లిలో తక్కువ కట్నం ఇచ్చారని ప్రమోద్ చెప్తూ సూటీపోటీ మాటలతో జీవన్లాల్ ఈ సందర్భాన్ని విచారమయం చేశాడు.
ఆమెను తన పుట్టింటికి పంపటానికి నిరాకరించి తన అహంభావాన్ని చూపించాడు. తాము తమ కూతురికి భారీగా కట్నం ఇచ్చి, పెండ్లిలో పంపామని, అత్తవారింట్లో ఆమెను చాలా మర్యాదగా చూస్తున్నారని గప్పాలు కొడతాడు. తన కొడుకు రమేశ్ తన సోదరిని తీసుకొని రావటానికి వెళ్ళాడు.
ఘనమైన వీడ్కోలుతో సోదరిని వెంటబెట్టుకొని హుందాగా తిరిగొస్తాడని గర్వంగా చెప్తాడు. అదే సమయానికి, వీటన్నింటిని తోసిపుచ్చి, సోదరి అత్తవారు తమకు దక్కవలసినంత కట్నం దక్కలేదని సోదరిని పంపించటానికి తిరస్కరించారని, అందులకే తాను ఒంటరిగా తిరిగి వచ్చానని రమేష్ చెప్తాడు. అనూహ్యమైన ఈ పరిణామానికి జీవన్లాల్ తన తప్పిదాన్ని గ్రహించి కమలను ప్రమోద్ పంపటానికి అంగీకరిస్తాడు. తను తన కూతురిని ఆదరించునట్లు తన కోడలిని కూడ సమానంగా ఆదరిస్తాడు.