Andhra Pradesh BIEAP AP Inter 2nd Year Hindi Study Material Pdf पद्यभाग 2nd Poem मीराबाई की पदावली Questions and Answers Summary.
Inter 2nd Year Hindi मीराबाई की पदावली Questions and Answers
मूल्यांकन हेतु
अ. नीचे दिए गए पदों का भावार्थ विशेषताएँ सहित लिखिए ।
१. हरि आप हरो जन री भीर ।
द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर ।
भगत कारण रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर ।
बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्जर पीर ।
दासी मीरा लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर ॥
कवि-परिचय : मीराबाई कृष्ण – भक्ति शाखा की हैं। इनकी सगुण भक्ति है और प्रेममार्गी भक्ति है । उन्होंने श्रीकृष्ण की भक्ति में तल्लीन होकर अनेक भावमय गेय पदों की रचना की ।
भावार्थ :- मीराबाई कहती हैं कि हे प्रभु, लोगों की पीडा दूर कीजिए | आपने इसके पहले द्रौपदी के वस्त्रहरण के समय लंबा वस्त्र देकर उनका मान बचाया। आप ने ही नृसिंह अवतार धारण कर भक्त प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा की। आप ने ही मगरमच्छ को मार कर उसके चंगल से गजराज को बचाया । मीराबाई विनती करती हैं कि मैं तो आपकी दासीहूँ आप मेरी भी पीडा दूर कीजिए ।
विशेषताएँ :- इस पद में अनन्य भक्ति, दास भाव, करूणामय चित्रण, भक्तवत्सलता के विविध उदाहरण आदि निहित हैं । भाषा व्रज मिश्रित राजस्थानी है । भाषा सरल सुबोध हैं । भक्ति – रस की प्रदानता है ।इसमें उदाहरण, अनुप्रास और श्लेष अलंकार हैं । यह पद गेय पद है |
२. पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे,
मैं तो मेरे नारायण की आपहिं हो गई दासी रे ॥
लोग कहै मीरा भई बावरी, न्यात कहै कुलनासी रे ।
विष का प्याला राणाजी भेज्या, पीवत मीरा हाँसी रे ॥
‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर, सहज मिले अविनासी रे ||
कवि-परिचय : मीराबाई कृष्ण भक्ति शाखा की कवयित्री प्रमुख हैं। इनकी सगुण भक्ति है और प्रेममार्गी भक्ति है । उन्होंने श्रीकृष्ण की भक्ति में तल्लीन होकर अनेक भावमय गेय पदों की रचना की ।
भावार्थ :- मीराबाई कहती हैं कि वे पैरों में पायल बाँधकर कृष्ण के सामने भक्ति में डूबकर नाच रही हैं। वे तो कृष्णकी दासी बन गॉईं। इससे लोग उन्हें पगली कहते हैं। ससुरालवाले उन्हें कुलनाशिनी कह रहे हैं । इसलिए उन्हें मारने केलिए राणा ने विष का प्याला भी भेजा है। मीरा ने कृष्ण के भरोसे हँसते हुए उस विष को पी लिया और कुछभी बुरा ना हुआ। वे कहती हैं कि उनके प्रभु श्रीकृष्ण बहुत चतुर हैं और उनके दर्शन मीरा को सुलभ हो गए हैं।
विशेषताएँ :- प्रस्तुत पद मीराबाई की सहज भक्ति का परिचायक है । इसमें राजस्थानी मिश्रित व्रज भाषा का प्रयोग किया गया है । भाषा सरल और सुबोध है । इस पद में गेयता है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार हैं । यह भावनात्मक शैली का पद है । इसमें भक्ति रस की प्रधानता है ।
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आ. सही विकल्प चुनकर दिये गये प्रश्नों के उत्तर लिखिए ।
प्रश्न 1.
मीराबाई का जन्म कहाँ हुआ ?
अ. मेड़ता (कुड़की)
आ. बृंदावन
इ. द्वारका
जवाब.
अ. मेड़ता (कुड़की)
प्रश्न 2.
मीरा के प्रभु कौन है ?
अ. राम
आ. कृष्ण
इ. हनुमान
जवाब.
आ. कृष्ण
प्रश्न 3.
प्रहलाद की रक्षा करने कृष्णा मे कौन सा रूपधारण किया ?
अ. शिव का
आ. नृसिंह का
इ. वामन का
जवाब.
आ. नृसिंह का
प्रश्न 4.
मीरा ने पैरों में क्या बाँधा है ?
अ. घूँघरू
आ. रस्सी
इ. कुछ नहीं
जवाब.
अ. घूँघरू
प्रश्न 5.
विष का प्याला किसने भेजा ?
अ. अकबर
आ. राणा
इ. कृष्ण
जवाब.
आ. राणा
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मीराबाई की पदावली Summary in Hindi
कवि परिचय
जीवन परिचयः मीराभाई का जन्म राजस्थान में मेड़ता के पास कुड़की गाँव में सन् 1498 ई. के आसपास हुआ था । उनके पिता रतनसिंह और पति भोजराज थे । वे बचपन से ही श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्त थीं । वे साधुओं के साथ कीर्तन-भजन करती रहती थी । इसे अमर्यादित व्यवहार समझकर उन्हें मारने के लिए विष का प्याला भेजा गया था। लेकिन भगवान की कृपा से वे बच गई । सन् 1547 ई. में वे स्वर्गवासी हुईं।
रचनाएँ : मीराबाई ने भगवान् श्रीकृष्ण के अटूट प्रेम में कई भावपूर्ण गेय पदों की वचना की है। नरसीजी को मायरा, राग गोविंद, राग सोरठ के पद, गीता गोविंद की टीका आदि इनकी रचनाएँ हैं ।
पाठ का सारांश
मीराबाई कृष्ण – भक्ति शाखा कि प्रमुख कवयित्रि हैं । उनकी सगुण भक्ति और प्रेम मार्गी भक्ति है। उन्होंने श्रीकृष्ण की भक्ति में तल्लीन होकर अनेक भावमय गेय पदों की रचना की ।
पद – १ : मीराबाई कहती हैं कि वे पैरों में पायल बाँधकर कृष्ण के सामने भक्ति में डूबकर नाच रही हैं। वे तो कृष्ण की दासी बन गईं। इससे लोग उन्हें पगली कहते हैं। ससुरालवाले उन्हें कुलनाशिनी कह रहे हैं । इसलिए उन्हें मारने केलिए राणा ने विष का प्याला भी भेजा है। मीरा ने कृष्णा के भरोसे हँसते हुए उस विष को पी लिया और कुछभी बुरान हुआ । वे कहती हैं कि उनके प्रभु श्रीकृष्ण बहुत चतुर हैं और उनके दर्शन मीरा को सुलभ हो गए हैं ।
पद – २ : मीराबाई कहती हैं कि मैंने भगवान के नामरूपी रत्नसंपदा प्रात्प कर ली । मेरे गुरू ने कृपा करके यह अमूल्य वस्तु मुझे प्रदान की थी। गुरू दीक्षा के कारण कई जन्मों से संचित मूल-धन अर्थाद् पुण्य फल प्राप्त कर लिया । संसार की सभी मोह मायाओं को
त्याग कर दिया। यह रामनाम का मूलधन खर्च करने पर कम नहीं होता। इसे चोर चुरा नहीं सकते। यह प्रतिदिन सवागुना बढ़ता रहता है । मैंने इसी सत्यनाम अर्थात् भगवान का नाम रूपी नौका पर सतार होकर संसार सागर को पार कर लिया है । इसका नाविक सद्गुरू हैं । अब मैं खुशी खुशी अपने प्रभु श्रीकृष्ण का गुण- गान कर रही हूँ ।
पद -३: मीराबाई कहती हैं कि हे प्रभु लोगों की पीडा दूर कीजिए । आपने इसके पहले द्रौपदी के वस्त्र हरण के समय लंबा वस्त्र देकर उनका मान बचाया । आप ने ही नृसिंह अवतार धारण कर भक्त प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा की। आप ने ही मगरमच्छ को मार कर उसके चंगल से गजराज को बचाया । मीराबाई विनती करती हैं कि मैं तो आपकी दासीहूँ आप मेरी भी पीडा दूर कीजिए ।
इस प्रकार, मीराबाई श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति प्रकट कवते हुए, अपनी पीडा को भी दूर करने का जोर देती हैं।
मीराबाई की पदावली Summary in English
Meerabai is a renowned poetess of Krishna – Devotion – Branch. She is a worshipper of god opossessed of attributes. Immersed in the supreme, she composed numerous soulful songs and verses.
Poem – 1: Meerabai says that she is dancing in front of Krishna by typing anklets on her feet. She becomes Krishna’s servant. So, people say that she is mad. The people of unlaws say that she is disgraced and blenished so, Rana has even sent a poison to kill her. Meerabai trusting Krishna, drank that poison and nothing bad hap- pened. She says that her Lord Krishna is very clear and become easier to have his Darshan.
Poem – 2: Meerabai says that I have acquired the wealth in form of the name of the god. By the grace of guru I got this precious thing. I got this capital that is the fruit of virtues, accumanated from so many briths. I gave up the worldly attachments, and affections and desiers. The basic wealth of Ram’s name does not decrease even after spending in chanting. It can not be stolen by thieves. It keeps increasing fourfold everyday. I have attained salvation by this true name, that is god. I have crossed the ocean of the world aboard the boat of Truth is the name of the god. The boat – man is sadguru. Now I am singing raises of my Lord Shri Krishna with pleasure.
Poem – 3: Meerabai says to the Lord to remove the troubles of people. Earlier you saved Draupada’s honour by giving her a long robe, when she as being disrobed. You incarnated as Narsimha and saved the life of prahlad. You killed the crocodile and saved the elephant from its clutches. Meerabai pleads Krishna that she is his servent and relieve her pain also.
In this way, Meerabai depicts her unique devotion towords Lord Krishna and emphasises to remove her pain too.
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मीराबाई की पदावली Summary in Telugu
మీరాబాయి కృష్ణభక్తి శాఖకు చెందిన ప్రముఖ కవయిత్రి. ఈమెది సగుణభక్తి మరియు ప్రేమ మార్గ భక్తి. ఈమె భక్తిలో తల్లీనమైపోయి అనేక భావమయ గీతాలు – పదాలు రచించారు.
పద్యం – 1 : కాళ్ళకు గజ్జెలు కట్టుకొని భక్తిలో లీనమై కృష్ణుని ఎదుట నర్తిస్తున్నది. ఆమైతే కృష్ణుని దాసి అయిపోయింది. అందుకు జనులు ఆమెను పిచ్చిది అంటున్నారు. అత్తింటివారు ఆమెను కులనాశిని అంటున్నారు. అందుచేతనే ఆమెను చంపటానికి రాణా విషం కప్పు పంపిస్తారు. మీరా కృష్ణుని పై ఉన్న అపారనమ్మకంతో, నవ్వుతూ ఆవిషం త్రాగుతుంది. కాని ఏ ఆపద కలుగదు. తన ప్రభువు శ్రీకృష్ణుడు చాలా చతురుడు. తనకు ఆయన దర్శనం సులభమయింది.
పద్యం – 2 : నేను భగవంతుని నామరూపంలో ఉన్న రత్నసంపదను పొందానని మీరాబాయి చెప్తుంది. ఇంకా ఇలా చెప్తుంది. నా గురువు కృపవలన ఈ అమూల్యవస్తువు నాకు లభించింది. గురుదీక్షవలన అనేక జన్మలలో ప్రోగుపడిన మూలధనం అంటే పుణ్యఫలం పొందాను. ప్రాపంచిక మోహమాయను త్యజించాను. ఈ రామనామమనే ధనాన్ని, ఖర్చుచేస్తే జపించటంలో తరుగదు. దీనిని దొంగిలించలేరు. పైగా ఇది ప్రతిదినమూ ఒకటింపావు రెట్లు పెరుగుతూ ఉంటుంది. ఇదే సత్యనామం అంటు భగవంతుని నామస్మరణ అనే నౌకపై పయనిస్తూ నేను భవసాగరాన్ని దాటాను. దీని నాయకుడు సద్గురువు. నేనిప్పుడు సంతోషంగా శ్రీకృష్ణుని పలువిధాల కీర్తిస్తున్నాను.
పద్యం – 3 : ప్రజలపీడను తొలగించు ప్రభూ అంటూ మీరాబాయి వేడుకొంటుంది. మునుపు మీరు ద్రౌపది వస్త్రాపహరణం సమయంలో చాలా పొడవైన చీరను ప్రసాదించి ఆమె మానాన్ని కాపాడినారు. మీరే నృసింహావతారం దాల్చి భక్త ప్రహ్లాదుని ప్రాణాలను రక్షించారు. మీరే మొసలిని చంపి మీతో మొరపెట్టుకున్న గజేంద్రుణ్ణి రక్షించారు. నేనైతే మీదాసిని. నాదుఃఖాన్ని కూడా దూరం చేయమని మీరాబాయి శ్రీకృష్ణుని వేడుకొంటుంది.
ఈ విధంగా మీరాబాయి శ్రీకృష్ణుని పట్ల తన అనుపమ భక్తిని చాటుతూ, తన పీడను కూడా దూరం చేయమని తనకు నొక్కి చెపుతుంది.
मीराबाई की पदावली कठिन शब्दार्थ
पद – 1
पग = पैर, కాళ్ళు
घूँघरू = पायल, नूपुर, पाजेब, అందెలు, గజ్జెలు
आपहि = खुदही, स्वयं, స్వయంగా
बावरी = पगली, పిచ్చిది
न्यात = परिवार के लोग, बिरादरी, పరిజనులు
कुलनासी = = कुल को नाश करनेवाली, వంశ వినాశకారిణి
प्याला = कटोरा, చిన్న గిన్నె
हाँसी = हँस दी, నవ్వింది
गिरिधर = गोवर्धन पर्वत को उठानेवाले, श्रीकृष्ण, గోవర్ధన పర్వతాన్ని ఎత్తిన శ్రీకృష్ణుడు
नागर = चतुर, చతురుడు, నిపుణుడు
अविनासी = श्रीकृष्ण (संदर्भार्थ), శ్రీ కృష్ణుడు (సందర్బార్థం)
पद – 2
पायो जी = पालिया है, పొందెను
राम-रतन-धन = राम-नाम रूपी धन, రామనామమనే ధనం
अमोलक = अनुमोल वस्तु, అమూల్యమైన వస్తువు
सतगुरू = सच्चे गुरू, సద్గురువు
किरपा = कृपा, दया, కృప, దయ
अपनाये = अपना लिया, దగ్గరకు తీసుకొన్నాను, అనుకూలంగా చేసుకున్నాను.
जनम = जन्म, జన్మ
पूँजी = कमाई ఆదాయము
जग = संसार, दुनिया, ప్రపంచం
खोवाये = खो दिया, పోగొట్టుకున్నాను
लूटै = चुरा सकते, దొంగిలించగలుగుతారు
सवायो = सवा गुना, ఒకటింపావు, 1 ¼, 1.25
सत की नाव = सत्य की नौका, సత్యమనే నౌక
खेवटिया = नाविक, నావికుడు
भव सागर = संसार रूपी समुद्र, ప్రపంచమనే సముద్రం
तर आयो = पार हो गया, దాటాను
हरख = हर्ष, హర్షము, ఆనందము
जस = यश, యశస్సు, కీర్తి
पद – 3
हरि = भगवान, ईश्वर, భగవంతుడు, ఈశ్వరుడు
हरो = हरण करो, హరించు, తొలగించు
भीर = कष्ट, दुःख, కష్టాలు, దుఃఖాలు
लाज = लज्जा, సిగ్గు
लाज राखी = మన మర్యాదలు కాపాడావు
चीर = वस्त्र, వస్త్రం
मगत = भक्ति, భక్తి
नरहरि = नृसिंहरूप, నరహరి, నృసింహరూపం
गजराज = ऐरावत, गजेंद्र, ఐరావతము, గజేంద్రుడు
कुण्जर = हाथी, ఏనుగు
पीर = वीड़ा, పీడ, కష్టం
म्हारी = हमारी, మా యొక్క
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मीराबाई के दोहे भावार्थ
पद – 1
पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे,
मैं तो मेरे नारायण की आपहिं हो गई दासी रे ॥
लोग कहै मीरा भई बावरी, न्यात कहै कुलनासी रे ।
विष का प्याला राणाजी भेज्या, पीवत मीरा हाँसी रे ॥
‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर, सहज मिले अविनासी रे ॥
कवि-परिचय : मीराबाई कृष्ण भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। इनकी सगुण भक्ति है और प्रेममार्गी भक्ति है । उन्होंने श्रीकृष्ण की भक्ति में तल्लीन होकर अनेक भावमय गेय पदों की रचना की ।
भावार्थ :- मीराबाई कहती हैं कि वे पैरों में पायल बाँधकर कृष्ण के सामने भक्ति में डूबकर नाच रही हैं। वे तो कृष्ण की दासी बन गईं । इससे लोग उन्हें पगली कहते हैं । ससुरालवाले उन्हें कुलनाशिनी कह रहे हैं। इसलिए उन्हें मारने केलिए राणा ने विष का प्याला भी भेजा है। मीरा ने कृष्ण के भरोसे हँसते हुए उस विष को पीलिया और कुछभी बुरा न हुआ । वे कहती हैं कि उनके प्रभु श्रीकृष्ण बहुत चतुर हैं और उनके दर्शन मीरा को सुलभ हो गए हैं।
विशेषताएँ :- प्रस्तुत पद मीराबाई की सहज भक्ति का परिचायक है | इसमें राजस्थानी मिश्रित व्रज भाषा का प्रयोग किया गया है । भाषा सरल और सुबोध है । इस पद में गेयता है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार हैं । यह भावनात्मक शैली का पद है । इसमें भक्ति रस की प्रधानता है ।
पद – 2
पायोजी मैंने राम रतन धन पायो ।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो ||
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो ।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन – दिन बढ़त सवायो ||
सत की नाव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो ।
‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख – हरख जस पायो ॥
कवि-परिचय : मीराबाई कृष्ण भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। इनकी सगुण भक्ति है और प्रेममार्गी भक्ति है । उन्होंने श्रीकृष्ण की भक्ति में तल्लीन होकर अनेक भावमय गेय पदों की रचना की ।
भावार्थ :- मीराबाई कहती हैं कि मैंने भगवान के नामरूपी रत्नसंपदा प्रात्प कर ली। मेरे गुरू ने कृपा करके यह अमूल्य वस्तु मुझे प्रदान की थी। गुरू दीक्षा के कारण कई जन्मों से संचित मूल- धन अर्थात् पुण्य फल प्राप्त कर लिया । संसार की सभी मोह मायाओं को त्याग कर दिया । यह रामनाम का मूलधन खर्च करने पर कम नहीं होता। इसे चोर चुरा नहीं सकते। यह प्रतिदिन
सवागुना बढ़ता रहता है । मैंने इसी सत्य नाम अर्थात् भगवान का नाम’ रूपी नौका पर सवार होकर संसार सागर को पार कर लिया है। इसका नाविक सद्गुरू हैं। अब मैं खुशी खुशी अपने प्रभु श्रीकृष्ण का गुण गान कर रही हूँ ।
विशेषताएँ :- इस पद में अमूल्य भक्ति रूपी धन, गुरू का महत्व, समर्पण की भावना आदि प्रतिबिंबित हैं । इस पद की भाषा राजस्थानी मिश्रित व्रज भाषा है | भाषा सरल और सुकोश्व है । यह पद में गेय शैली है और यह संगीतात्मक है । इसमें रूपक, अनुप्रास अलंकार हैं । इसमें शांति रस और भक्ति रस हैं ।
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पद – 3
हरि आप हरो जन री भीर ।
द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर ।
भगत कारण रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर । कुण्जर पीर ।
बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी
दासी मीरा लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर ।
कवि-परिचय : मीराबाई कृष्ण भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। इनकी सगुण भक्ति है और प्रेममार्गी भक्ति है । उन्होंने श्रीकृष्ण की भक्ति में तल्लीन होकर अनेक भावमय गेय पदों की रचना की ।
भावार्थ :- मीराबाई कहती हैं कि हे प्रभु लोगों की पीडा दूर कीजिए । आपने इसके पहले द्रौपदी के वस्त्र हरण के समय लंबा वस्त्र देकर उनका मान बचाया। आप ने ही नृसिंह अवतार धारण कर भक्त प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा की। आप ने ही मगरमच्छ को मार कर उसके चंगल से गजराज को बचाया । मीराबाई विनती करती हैं कि मैं तो आपकी दासीहूँ आप मेरी भी पीडा दूर कीजिए ।
विशेषताएँ :- इस पद में अनन्य भक्ति, दास भाव, करूणामय चित्रण, भक्तवत्सलता के विविध उदाहरण आदि निहित हैं । भाषा व्रज मिश्रित राजस्थानी है । भाषा सरल सुनोध हैं । भक्-ि रस की प्रधानता है । इसमें उदाहरण, अनुप्रास और श्लेष अलंकार हैं । यह । पद गेय पद है |